बाल विकास 
एक बालक को समझने के लिए यह आवश्यक है कि उसे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाय जिसका विकास कुछ निश्चित प्रतिमानो के अनुसार होता है !ये इस बात को निर्दिष्ट करता है कि विकास एक सतत प्रक्रिया है , जो विकास के कुछ निश्चित प्रतिमानों का अनुसरण करता है ! विकासात्मक परिवर्तन अचानक नहीं होते है! बालक कभी भी विकास की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में अचानक से नहीं आता !इस प्रक्रिया में परिपक्वता के सिद्धांत का अनुसरण किया जाता है !जीवन के आरम्भ के वर्षों में विकास तीव्र गति से  बढ़ता है !बाल्यकाल में मानसिक एवं शारीरिक विकास अत्यधिक तीव्र होता है !कुछ महीनो या कुछ वर्षों मानव के जन्म से लेकर उसके जीवन भर तक होने वाले जैविक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों को बाल विकास कहा जा सकता है !इसके अंतर्गत बालक धीरे धीरे निर्भरता से स्वायत्ता की ओर बढ़ता है ! 
बाल विकास की अवस्थायें :     मनोवैज्ञानिकों के अनुसार विकास की निम्न अवस्थायें होती है !

  • शैशवावस्था  [०-4  वर्ष ]
  • पूर्व बाल्यावस्था [4 -6 वर्ष ]
  •                        उत्तर बाल्यावस्था [6 -8 वर्ष]           
  • बाल्यावस्था [8 -12 वर्ष ]
  • वयस्कावस्था 
                                       बाल्यावस्था के अपेक्षित विकासात्मक प्रकार्य 

  • चलना सीखना 
  • भोजन खाना सीखना 
  • बोलना सीखना 
  • शौच प्रक्रिया सीखना तथा उस पर कण्ट्रोल करना 
  • लिंग विभेद को समझना  
  • शारीरिक क्रिया में स्थिरता प्रदान करना 
  • माता-पिता ,भाई-बहिन ,दोस्तों और अन्य लोगो से भावात्मक  सम्बन्ध स्थापित करना 
  • सही और गलत में पहचान करना औपचारिक शिक्षा ग्रहण करना 


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